मैं बहुत लालची एक्टर हूं – विद्या बालन

I am very Greedy Actor - Vidya Balan

फिल्म ‘तीन’ की असफलता के बाद एक्ट्रेस विद्या बालन फिर एक बार सिल्वर स्क्रीन पर अपनी हिट फिल्म ‘कहानी’ की सीक्वल ‘कहानी 2’ से वापसी कर रही हैं। पिछले दिनों उनसे हमारी हुई मुलाकात में विद्या बालन ने अपनी फिल्म और डायरेक्टर सुजॉय घोष के बारे में क्या कहा ? चलिए जानते हैं

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पंकज पाण्डेय  

 

फिल्म ‘कहानी 2’ फिल्म ‘कहानी’ से कितनी अलग है?

दोनों फ़िल्में एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ‘कहानी 2’  एक इमोशनल थ्रिलर फिल्म है, जो पूरी तरह से मां-बेटी के रिश्ते पर आधारित है। ये फिल्म ‘कहानी’ की सीक्वल नहीं फ्रेन्चाइसी है। जब फिल्म के डायरेक्टर सुजॉय घोष ने मुझे फिल्म की कहानी सुनाई तब मैंने उनसे कहा कि लोगों की फिल्म से अपेक्षा ये होगी कि आप ‘कहानी’ की स्टोरी को इस फिल्म में जारी रखेंगे, तब उन्होंने कहा कि लोगों को इस तरह की कोई गलतफहमी न हो, इसलिए हम ‘कहानी 2’ के ठीक बाद दुर्गा रानी सिंह भी लिख देंगे। दरअसल, सुजॉय जब ‘कहानी 2’ की स्क्रिप्ट लिख रहे थे, तब उन्हें कुछ खास नहीं लग रहा था, तब उन्होंने उसे रोककर दुर्गा रानी सिंह लिखना शुरू किया लेकिन वो इसे भी ठीक तरह से नहीं कर पाए और फिर उन्होंने दोनों फिल्मों को मिलाकर ‘कहानी 2’  दुर्गा रानी सिंह बनाया।

फिल्म में अपने किरदार के बारे में कुछ बताए ?

 फिल्म में मैं दुर्गा रानी सिंह का किरदार निभा रही हूं, जो बहुत ही साधारण औरत है। वो हमेशा डरी सहमी रहती है लेकिन बात जब उसकी बेटी के अगवाह होने और उसकी सुरक्षा की आती है तो वो वाकई में दुर्गा बन जाती है। उसकी झिझक और डर दोनों गायब हो जाता है। दुर्गा रानी सिंह एक बहुत ही सिंपल औरत है इसलिए फिल्म में मेरा लुक भी काफी सिंपल रखा गया है। सुजॉय चाहते थे कि मैं सिंपल दिखूं इसलिए उन्होंने मुझे नैचुरल मेकअप के लिए कहा लेकिन अपने किरदार के साथ इंसाफ करने के लिए मैंने शूटिंग के दौरान चेहरे पर मॉइस्चराइजर तक नहीं लगाया क्योंकि मैं चाहती थी कि मेरी स्किन नेचुरल तौर पर रूखी नज़र आये न कि मेकअप की सहायता से।

डायरेक्टर सुजॉय घोष और आपकी दोस्ती के बारे में क्या कहेंगी ?

मैंने सुजॉय के साथ अब तक दो फ़िल्में ही की हैं, मैं ये तो नहीं कह सकती कि हम दोनों अच्छे दोस्त हैं लेकिन ये जरूर बताऊंगी कि हम आपस में लड़ते बहुत हैं और शायद दोस्तों से ही लड़ा भी जाता है। बतौर एक्टर और डायरेक्टर हमारे बीच बहुत ही अच्छी अंडरस्टैंडिंग और ट्यूनिंग है, जिसका हम दोनों को काफी फायदा भी होता है। हमें एक-दूसरे से कुछ कहने की जरूरत नहीं होती, सुजॉय के कहने से पहले मैं समझ जाती हूं कि वो क्या कहना चाहते हैं और मेरे कहने से पहले वो मेरी बात को समझ जाते हैं। अच्छा लगता है ये देखकर कि कोई डायरेक्टर आपको इतना समझता है, न सिर्फ आपके काम को बल्कि आपको भी और आप पर इतना ट्रस्ट करता है।

लोग आपको फीमेल सेंट्रिक फिल्म की ट्रेंड सेटर कहते हैं, आप इस बात से कितनी सहमत हैं?

अब कोई खुद से तो अपने आपको ट्रेंड सेटर नहीं कह सकता लेकिन ये जरूर कहना चाहूंगी कि वो दौर ही कुछ ऐसा था कि मुझे एक के बाद एक फीमेल सेंट्रिक फिल्म गई और फिल्म सफल भी हुईं। मेरी मानें तो फिल्म समाज का आईना होती है, पहले की फिल्मों में औरतों को देवी या डायन दिखाया जाता था लेकिन आज की फिल्म में औरतों को इंसान की तरह दिखाया जाता है, जहां उनकी अच्छाई और बुराई दोनों दिखाई जाती है। आज की महिलाएं स्वतंत्र  और आत्मनिर्भर भी हैं इसलिए ऐसी फ़िल्में बन भी रही हैं और लोगों द्वारा पसंद भी की जा रही हैं। वैसे एक बात ये भी है कि मैं एक लालची एक्टर हूं, मेरे सामने कोई भी अच्छा रोल आता है तो मैं कूद पड़ती हूं, लगता है मुझे इसी से फायदा हुआ है।
जब आप फिल्मों को लेकर गलत चुनाव करती हैं, तो कैसा महसूस होता है?

उतार-चढ़ाव हर इंसान की जिंदगी में आते हैं, मेरी भी जिंदगी का ये हिस्सा रहे हैं। जब मेरी फिल्म नहीं चलती तब मैं भी अपसेट हो जाती हूं, अपने आप पर गुस्सा करती हूं, तब मुझे मेरे अपने बहुत समझाते हैं और तब मुझे ये अहसास होता है कि ऊपर नीचे होना दुनिया का नियम है। हां, ये बात भी है कि जब कोई फिल्म फ्लॉप हो जाती है तो उससे जुडी सारी चीजों से नफ़रत हो जाती है। उसका गाना भी तकलीफ देता है, ठीक उसी तरह जिस तरह ब्रेकअप हो जाने पर पार्टनर से जुडी कोई चीज़ तकलीफ देती है।

 
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